गैंगस्टर अरुण गवली के बाहर आने के रास्ते खुल गए हैं. दरअसल, उसके फरलो के अनुरोध को बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है. अरुण गवली फिलहाल नागपुर जेल में बंद है.



 बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर  बेंच ने गैंगस्टर अरुण गवली का 28 दिनों का फरलो मंजूर कर दिया है. अरुण गवली फिलहाल नागपुर जेल में बंद है. उसके फरलो की याचिका को डीआईजी (कारावास) ने खारिज कर दिया था, जिसके बाद उसने हाई कोर्ट का रुख किया था. बता दें कि इससे पहले मार्च में अरुण गवली ने अपनी उम्र का हवाला देते हुए समय से पहले रिहा करने की अपील की थी. 

गवली को शिवसेना के कॉर्पोरेटर की हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. यह हत्या 2007 में की गई थी. गवली ने कोर्ट से अपील की थी कि उसकी उम्र 70 साल से अधिक हो गई है लिहाजा उसे रिहा कर दिया जाए. गवली के वकील ने तब यह दलील दी थी कि वह अपने कारावास के 14 साल पूरा कर चुका है और उसकी उम्र 65 साल से ऊपर है, तो इसलिए वह सरकारी अधिसूचना के मुताबिक रिहा किए जाने का अधिकारी है. 

मकोका में दोषी पाए जाने पर नहीं मिला इस नियम का लाभ
वकील ने कहा था कि उसे उम्र संबंधी बीमारी है. उसने महाराष्ट्र कारावास (सजा की समीक्षा) नियम के 2015 के संशोधन के पूर्वव्यापी आवेदन को चुनौती थी. इस संशोधन के तहत उन लोगों को 2006 के क्षमा करने के नियम का लाभ नहीं मिलता है जो मकोका के तहत दोषी पाए गए हैं और अरुण गवली मकोका के तहत दोषी पाया गया था.

फिल्म के टिकट की करता था कालाबाजारी
बता दें कि 70 के दशक में बायकुला के पैलेस सिनेमा में टिकटों की कालाबाजारी से उसने अपने काले कारनामे की शुरुआत की थी. बताया जाता है कि गवली के डॉन बनने की कहानी तब शुरू हुई जब उसने जुबैदा मुजावर नाम की महिला से शादी की थी. इस महिला ने हिंदू धर्म को स्वीकार कर लिया था. जुबैदा आगे आशा गवली के रूप में जानी गई. कहते हैं कि जुबैदा उसके काले कारनामे में पूरा साथ देती थी. जुबैदा के साथ ने उसे इतनी ताकत दी कि वह शिवसेना, मुंबई पुलिस और दाउद इब्राहिम सामना कर पाया. 

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