दुनियाभर के वैज्ञानिकों को चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, इसी पर भारत का चंद्रयान-3 लैंड करेगा. आखिर क्यों है यह इतना खास, आइये जानते हैं सबकुछ.

भारत का चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने के लिए तैयार है. 23 अगस्त की शाम ISRO इसकी सॉफ्ट लैंडिंग कराएगा, जिस पर पूरी दुनिया का नजर टिकी है. आखिर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में ऐसा क्या है, जो दुनियाभर के वैज्ञानिकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, आइये जानते हैं. 

वैज्ञानिक मानते हैं कि चंद्रमा पर इतने गहरे गड्ढे भी हैं, जहां अरबों वर्षों से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है. इन क्षेत्रों में तापमान आश्चर्यजनक रूप से माइनस 248 डिग्री सेल्सियस (-414 फारेनहाइट) तक गिर जाता है. यहां चंद्रमा की सतह को गर्म करने वाला कोई वातावरण नहीं है. चंद्रमा की इस पूरी तरह अज्ञात दुनिया में किसी भी इंसान ने कदम नहीं रखा है. नासा के मुताबिक, चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव रहस्य, विज्ञान और उत्सुकता से भरा है.

दक्षिणी ध्रुव की स्पेस रेस में आखिर क्या खास है?

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोई अचरज की बात नहीं है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने के लिए एक तथाकथित स्पेस रेस (अंतरिक्ष दौड़) चल रही है. यह स्थान भूमध्य रेखा के आसपास उस स्थान से बहुत दूर है, जहां अमेरिकी मिशन अपोलो लैंड हुआ था. इसरो से पहले रूस का चंद्र मिशन लूना-25 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करने वाला था, लेकिन 20 अगस्त को वह चंद्रमा पर हादसे का शिकार हो गया और मिशन फेल हो गया.



भारत 2026 तक चंद्रमा के अंधेरे वाले क्षेत्रों का पता लगाने के लिए जापान के साथ एक ज्वाइंट लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन मिशन की योजना भी बना रहा है. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों को खोज के लिए इतना क्यों आकर्षित कर रहा है? वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका प्रमुख कारण 'पानी' है.

चंद्रमा के गड्ढों में बर्फ मौजूद होने का मिला डेटा

बीबीसी की रिपोर्ट कहती है कि 14 वर्षों से चंद्रमा का परिक्रमा कर रहे नासा के अंतरिक्ष यान लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर की ओर से इकट्ठा किए गए डेटा से पता चलता है कि स्थायी रूप से छाया वाले कुछ बड़े गड्ढों में वॉटर आइस (पानी की बर्फ) मौजूद है, जो संभावित रूप से जीवन को बनाए रख सकती है. 

भारत का चंद्रयान-1 था पानी के सबूत खोजने वाला पहला मिशन

वैक्यूम के कारण पानी ठोस या वाष्प के रूप में मौजूद है. वायुमंडल बनाने के लिए चंद्रमा के पास पर्याप्त गुरुत्वाकर्षण नहीं है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 2008 में लॉन्च हुआ भारत का चंद्रयान-1 चंद्र मिशन चंद्रमा पर पानी के साक्ष्य खोजने वाला पहला मिशन था.

भारत 2026 तक चंद्रमा के अंधेरे वाले क्षेत्रों का पता लगाने के लिए जापान के साथ एक ज्वाइंट लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन मिशन की योजना भी बना रहा है. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों को खोज के लिए इतना क्यों आकर्षित कर रहा है? वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका प्रमुख कारण 'पानी' है.

चंद्रमा के गड्ढों में बर्फ मौजूद होने का मिला डेटा

बीबीसी की रिपोर्ट कहती है कि 14 वर्षों से चंद्रमा का परिक्रमा कर रहे नासा के अंतरिक्ष यान लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर की ओर से इकट्ठा किए गए डेटा से पता चलता है कि स्थायी रूप से छाया वाले कुछ बड़े गड्ढों में वॉटर आइस (पानी की बर्फ) मौजूद है, जो संभावित रूप से जीवन को बनाए रख सकती है. 

भारत का चंद्रयान-1 था पानी के सबूत खोजने वाला पहला मिशन

वैक्यूम के कारण पानी ठोस या वाष्प के रूप में मौजूद है. वायुमंडल बनाने के लिए चंद्रमा के पास पर्याप्त गुरुत्वाकर्षण नहीं है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 2008 में लॉन्च हुआ भारत का चंद्रयान-1 चंद्र मिशन चंद्रमा पर पानी के साक्ष्य खोजने वाला पहला मिशन था.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

प्रोफेसर बार्बर के मुताबिक, इसमें कोई संदेह नहीं है कि अंतरिक्ष उद्यमी चांद पर मौजूद बर्फ को स्थानीय रूप से मिलने वाले पानी के रूप में देखते होंगे जो अंतरिक्ष यात्रियों के काम आ सकता है. यही नहीं, पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन परमाणुओं में तोड़ा जा सकता है और दोनों का इस्तेमाल रॉकेट दागने के लिए प्रणोदक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों को पहले यह पता लगाना होगा कि चंद्रमा पर कितनी बर्फ है, किस रूप में है और क्या इसे पीने के लिए सुरक्षित बनाने के लिए निकाला और शुद्ध किया जा सकता है.

पानी के अलावा दूसरा पहलू सौर ऊर्जा का संसाधन भी है

नासा के एक परियोजना वैज्ञानिक नूह पेट्रो कहते हैं कि इसके अलावा, दक्षिणी ध्रुव के कुछ छोर लंबे समय तक सूर्य की रोशनी से नहाए रहते हैं, जिसकी अवधि पृथ्वी के लगातार 200 दिनों के बराबर हो सकती है. इसलिए इस ध्रुव में यह क्षमता है कि चंद्रमा आधारित बिजली उपकरण स्थापित कर सौर ऊर्जा का एक अन्य संसाधन बनाया जा सकता है.

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव सौरमंडल के बड़े पैमाने पर प्रभाव वाले क्रेटर (गड्ढे) के किनारे स्थित है. जिसका व्यास 2,500 किमी (1,600 मील) में फैला और 8 किमी तक की गहराई तक पहुंचता है. यह गड्ढा सौर मंडल के भीतर सबसे प्राचीन फीचर्स में से एक है. पेट्रो कहते हैं कि दक्षिणी ध्रुव पर उतरकर आप यह समझना शुरू कर सकते हैं कि इस बड़े गड्ढे के साथ क्या हो रहा है.

चंद्रयान-3 मिशन का एक उद्देश्य यह भी

बता दें कि 2019 में असफल लैंडिंग प्रयास के बाद भारत अब ध्रुव के पास सटीक चंद्र स्पर्श के लिए अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना चाहेगा. इसका उद्देश्य चंद्रमा के बहिर्मंडल- एक अत्यंत विरल (कम घने) वातावरण- की जांच करना और ध्रुवीय रेजोलिथ (ठोस पदार्थ की परत) का विश्लेषण करना भी है, जो अरबों वर्षों से जमा हुए कणों और धूल का ढेर है जो एक आधारशिला के ऊपर स्थित है.






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